बहरोड़ के 100 वर्ष के बुजुर्ग जिन्होंने आजादी भी देखी और अंग्रेजों का शासन भी न

 इंदिरा कॉलोनी निवासी मनभा देवी,उम्र 100 वर्ष ।


कस्बे की शायद सबसे उम्रदराज महिला ने बातचीत में बताया कि पहले अंग्रेजों को कभी क्षेत्र में देखा नहीं लेकिन 1947 में देश के आजाद होने के बाद इलाके में पटाखे फोड़े गए , स्कूलों व चौपाल में तिरंगा लहराया गया, यहाँ लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई और बूँदी मिठाई बाँटकर जश्न मनाया गया । उस समय आसपास में कोई स्कूल नहीं था तो इन्होंने शिक्षा भी ग्रहण नहीं की । महिलाओं पर पाबंदियां थी और घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था । शिक्षा दीक्षा नहीं होने के इनका विवाह भी जल्दी हो गया था और 1947 से पूर्व एक संतान भी थी । इन्होंने उस समय बंटवारे की लड़ाई के दौरान हिंदू मुसलमानों की लड़ाई के बारे में भी लोगों से सुना और नीमूचाना की लड़ाई भी देखी । इनके बड़े पुत्र केवल कृष्ण माँढैया पंचायत विभाग में बीडीओ के पद पर कार्यरत हैं ,इन्होंने बताया कि माताजी ने हमें आजादी की बहुत बातें बताई हैं ।


2. गंडाला निवासी रघुवीर सिंह, उम्र 100 वर्ष ।


इन्होंने आजादी से पहले अंग्रेजों को नहीं देखा लेकिन राजनेता को भाषण देते हुए देखा । इन्होंने बताया कि आजादी के बाद स्कूल में झंडा फहराया गया और पूरे गाँव में खांड शक्कर बांटा गया और ग्रामीण एक जगह इकट्ठे हुए और खुशियाँ मनायी । आजादी से पूर्व ही इनका विवाह हो गया था व इनके एक संतान हो चुकी थी ।इनके पौत्र महिपाल, राजकुमार ने बताया कि बाबा को आजादी की ज्यादा बातें याद नहीं क्योंकि अंग्रेज कभी इस इलाके में नहीं आये लेकिन क्रांतिकारी अवश्य आते जाते थे लेकिन उनकी जानकारी नहीं होती थी । उन दिनों पास में एक स्कूल था तो बाबा वहां पर जाया करते थे और इन को शिक्षित है और यह अखबार वगैरह पढ़ लेते थे उस समय इन्होंने नारनौल में हिन्दू मुसलमान की लड़ाई देखी थी और इन्हें याद है कैसे हिंदुओं के सर कलम हुई लाशें गाड़ियों में भरकर आती थी, जवाब में हिंदुओं ने भी मुस्लिमों की लाशें दफना दीं थी और उस स्थान को आज नारनौल में ऐतिहासिक छत्ते के नाम से जाना जाता है । उस समय कई हिंदुओं ने बंटवारे में छूटी मुस्लिम महिलाओं से शादी भी कर ली थी । बाबा को भगत सिंह,सुखदेव ,चंद्रशेखर आजाद जिसे क्रांतिकारियों के नाम भी याद हैं ।

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