अधिक मतदान किस पार्टी के पक्ष में ??
2018 में 74.71 प्रतिशत मतदान हुआ था, तब कांग्रेस को भाजपा से एक लाख 70 हजार वोट ज्यादा मिले और सरकार बनी।
इस बार 74.96 प्रतिशत मतदान हुआ है तो क्या भाजपा की सरकार बनने के आसार है ?
ख्वाजा साहब की दरगाह से लेकर पोकरण तक वोटों का धु्रवीकरण।
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राजस्थान में विधानसभा चुनाव के लिए 25 नवंबर को मतदान हुआ। मतदान के बाद से ही मतदान प्रतिशत को लेकर हार-जीत के गणित लगाए जा रहे हैं। स्वाभाविक है कि इस गणित में पांच वर्ष पहले हुए मतदान के प्रतिशतों को आधार बनाया जा रहा है।
निर्वाचन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018 में प्रदेश में 74.71 प्रतिशत मतदान हुआ। मतदान के तुरंत बाद कांग्रेस ने दावा किया यह अधिक मतदान भाजपा सरकार के खिलाफ है। मतदाताओं ने वोट के माध्यम से भाजपा सरकार के खिलाफ गुस्सा प्रदर्शित किया है। जब परिणाम आए तो कांग्रेस का यह दावा सही साबित हुए क्योंकि जिस भाजपा के पास 162 विधायक थे, उसके पास घटकर मात्र 72 विधायक रह गए। जबकि कांग्रेस को 99 सीटें मिली और फिर सरकार बनाने लायक बहुत जुटा लिया गया।
वर्ष 2018 के चुनाव में भले ही कांग्रेस ने सरकार बनाई हो, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के मतों का अंतर मात्र 1 लाख 70 हजार का रहा । अब जब 2023 में मतदान 74.96 प्रतिशत हुआ है तो भाजपा का दावा है कि यह अधिक मतदान मौजूदा कांग्रेस सरकार के खिलाफ है। लोगों में वोट देकर अपने गुस्से को प्रदर्शित किया है यानी जो दावा कांग्रेस ने 2018 में किया था, वही दावा आज भाजपा कर रही है। भाजपा के इस दावे में कितना दम है, इसका पता तो तीन दिसंबर को परिणाम वाले दिन ही चलेगा, लेकिन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का दावा है कि इस बार सरकार के खिलाफ मतदाताओं में कोई नाराजगी नहीं है। मतदान अधिक होने का कारण सरकार की गारंटी योजनाएं हैं। कांग्रेस ने जो वादे किए हैं, लोग उन्हें पूरा होना देखना चाहते हैं।
जानकारों का मानना है कि इस बार कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों में हार जीत के मतों का अंतर बहुत कम रहगा। ऐसे में परिणाम चौंकाने वाले भी हो सकते हैं। प्रदेश में 199 में से 25 से ज्यादा ऐसे क्षेत्र हैं, जहां निर्दलीय उम्मीदवारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। कुछ क्षेत्रों में छोटे दलों के उम्मीदवार भी मजबूत स्थिति में है। कई क्षेत्रों में तो भाजपा-कांग्रेस की जीत निर्दलीय उम्मीदवारों को मिलने वाले वोटों पर निर्भर है।
वोटों का ध्रुवीकरण
कांग्रेस और भाजपा जीत के कितने भी दावे कर लें, लेकिन इन चुनावों में वोटों का ध्रुवीकरण जबरदस्त हुआ है। प्रभावशाली जातियों के अलावा हिंदू-मुस्लिम का फैक्टर भी प्रभावी रहा है। धर्मनिरपेक्षता में भरोसा रखने वाले माने या नहीं लेकिन मतदान हिंदू और मुस्लिम में विभाजित रहा है। अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह से जुड़े मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों से लेकर लोक देवता बाबा रामदेव के समाधि स्थल पोखरण तक के वोटों का ध्रुवीकरण देखने को मिला है।
अजमेर में मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में कांग्रेस उम्मीदवार महेंद्र सिंह रलावता के पक्ष में एकतरफा मतदान हुआ तो पोकरण विधानसभा क्षेत्र में 87.7 प्रतिशत से अधिक मतदान बताता है कि दोनों पक्षों ने ताकत लगाई है। यहां कांग्रेस के सालेह मोहम्मद और भाजपा के महंत प्रतापपुरी के बीच कड़ा मुकाबला है। इसी प्रकार तिजारा में 85.1 प्रतिशत रिकॉर्ड मतदान हुआ है। यहां भाजपा ने अलवर के सांसद बाबा बालक नाथ को उम्मीदवार बनाया तो कांग्रेस ने इमरान खान को मैदान में उतारा है। मुस्लिम बाहुल्य माने जाने वाले जयपुर के हवामहल, किशनपोल, नागौर के डीडवाना, सवाई माधोपुर आदि में भी वोटों का ध्रुवीकरण देखने को मिला है। पुष्कर तीर्थ से चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार श्रीमती नसीम अख्तर ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है।
कांग्रेस ने इस बार 15 मुस्लिम उम्मीदवार बनाए जबकि भाजपा ने एक भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार घोषित नहीं किया। यहां तक कि यूनुस खान जैसे पूर्व मंत्री तक को भाजपा ने उम्मीदवार नहीं बनाया। यूनुस खान को मजबूरी में डीडवाना से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ना पड़ा।
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