बच्चों को भेजें विदेश लेकिन अपने बुढ़ापे का भी रखें ख्याल ...
आज की सच्चाई है ...
दिखावे की रेस में खुद को आगे दिखाने के लिए लोग अपने बच्चों को पैसे या कर्जे के दम पर बाहर भेज देते हैं ...
फिर वहाँ इश्क और फिर ऑफ कोर्स शादी ... फिर कौन माँ बाप ...
पश्चिमी सभ्यता ने हमारी संस्कृति को निश्चित रूप से दूषित किया है ....
कमाल की बात यह है," गोरे हमारी संस्कृति अपना रहे हैं और *ज्यादा पढ़े लिखे या कहें अंग्रेजी बोलने वाले* उस सभ्यता को पसंद कर रहे हैं जहाँ 16 साल के बाद ही बच्चे को खुद के हाल पर छोड़ दिया जाता है .... वह बच्चा भला कैसे क़द्र करेगा माता पिता की ।"
लानत है ऐसी विदेशी पढ़ाई और विदेशी पैसे पर जहाँ ,"बुढ़ापे में माँ बाप को खुद खाना बनाना पड़े ।"
अकेले बहरोड़ में ऐसे कांड होने वाले हैं और अलवर में तो हो ही रहे हैं ।
अंत में मेरे देश जैसा कोई देश नहीं है और न ही कहीं की संस्कृति ।
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