4 साल में 281 मौतें सिर्फ बोरवेलों में गिरने से , कौन है जिम्मेदार और खोदने वालों के लिए क्या है कानून ..? आखिर कब तक बोरवेल में गिरकर मरते रहेंगे बच्चे?
खेत में खुले पड़े बोरवेल में गिरने से हर साल औसतन 50-60 लोगों की मौत हो जाती है.
इन मामलों पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में निर्देश जारी किए थे. इसके बावजूद बोरवेल में गिरने से मौत के मामले कम नहीं हो सके ।एनसीआरबी की रिपोर्ट्स के मुताबिक, चार साल में देशभर में 281 लोगों की मौत बोरवेल में गिरकर हुई है.
हाल ही में, एक तीन साल की बच्ची चेतना राजस्थान के कोटपुतली-बहरोड़ जिले में एक खुले बोरवेल में गिर गई थी। उसे 150 फीट गहरे बोरवेल से बचाने के लिए एनडीआरएफ और एसडीआरएफ को तैनात किया गया था। इसके अलावा, नौ दिसंबर को पांच साल का आर्यन राजस्थान के दौसा में खेलते समय 150 फुट गहरे बोरवेल में गिर गया था और 55 घंटे के बचाव अभियान के बाद उसे बेहोश निकाला गया था और अस्पताल पहुंचने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया था।
आंकड़ों के अनुसार अब तक पिछले 4 सालों में इन खुले बोरवेलों में गिरने से 281 लोगों की मौत हो चुकी है ।
इन सबमें 48 से 170 घंटे तक का रेसक्यू ऑपरेशन चलता है और 165 घण्टे चले राजस्थान के सबसे बड़े रेसक्यू ऑपरेशन के बाद भी चेतना को नहीं बचाया जा सकता ।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की 14 साल से उड़ रहीं धज्जियां, बोरवेल पर दिए गए निर्देशों की हो रही अनदेखी ।
सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में तत्कालीन सीजेआई बालकृष्णन की पीठ ने स्वतः संज्ञान लेकर सरकारी एजेंसियों को निर्देश दिया था कि सभी ड्रिलिंग एजेंसियों, सरकारी, अर्ध-सरकारी या निजी, का पंजीकरण अनिवार्य होना चाहिए। कुएं के पास निर्माण के समय निम्नलिखित विवरण के साथ एक साइनबोर्ड का निर्माण: (ए) कुएं के निर्माण या पुनर्वास के समय ड्रिलिंग एजेंसी का पूरा पता, (बी) उपयोगकर्ता एजेंसी या मालिक का पूरा पता होना चाहिए।
3 फरवरी, 2020 को खुले हुए बोरवेल और ट्यूबवेल में बच्चों के गिरने के मामलों के साथ शीर्ष अदालत ने अधिवक्ता जी.एस. मणि द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की थी जिन्होंने इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने में विफल रहने के लिए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। शीर्ष अदालत ने अपने 2010 के आदेश के अनुपालन पर केंद्र और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है।
शीर्ष अदालत द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में निर्माण के दौरान कुएं के चारों ओर कांटेदार तार की बाड़ लगाना, कुएं के ऊपर बोल्ट के साथ तय स्टील प्लेट कवर का उपयोग करना और नीचे से जमीनी स्तर तक बोरवेल को भरना शामिल था।
इसकी ऊंचाई 0.30 मीटर होनी चाहिए, प्लेटफार्म जमीन में 0.30 मीटर गहराई तक बनाना होगा। केसिंग पाइप के मुंह के पर स्टील की प्लेट वेल्ड की जाएगी या नट-बोल्ट से अच्छी तरह कसा होगी।
इस व्यवस्था का मकसद नलकूप के मुंह के खुले रहने के कारण होने वाले संभावित खतरों से बच्चों को बचाना है।
एक पल के लिए हम मान लेते हैं कि ,"जब इन खुले बोर में कोई गिरता है तो उसे सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी प्रशासन की होती है टेक्निकली ।"
लेकिन जो खुला छोड़ देता है *चेतनाओं* को मरने के लिए, उनका क्या ...?
जो खुला छोड़ता है पूरी जिम्मेदारी उन लोगों की बनती है उस बोरवेल को बन्द करने की और पूरे गाँव के पंच और सरपंचों को पूरी जानकारी होती है किसने बोर खोदा और किस किसने खुला छोड़ दिया ....!!
यदि पंच/सरपंच और जिम्मेदार प्रशासन को उनकी सूचना दे और प्रशासन उन्हीं लोगों को पाबंद कर दे तो .... *परिणाम सुखद आएगा ।*
*वैसे भी जो खोदे गड्ढा, उसे भरने की जिम्मेदारी भी उसी की ही होनी चाहिए, नैतिक रूप से ।*
और फिर कोई भी *चेतना* राजस्थान में ही नहीं वरन देश के किसी भी कोने में असामयिक मृत्यु का शिकार नहीं होगी ।
संजय हिंदुस्तानी,
जर्नलिस्ट एन्ड ब्लॉगर
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