"निर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय,मरे जीव की चाम सों,लोह भसम होई जाय।" बेईमानी उतनी करें जिसका आप आनंद उठा सकें अन्यथा कष्ट ही भोगना पड़ेगा।

सिकंदर जब मरा तो उसके हाथ अर्थी बाहर लटक रहे थे। किसी ने पूछा हाथ बाहर क्यों लटका रखे है? तो वजीर ने कहा,"सिकंदर भी अपने साथ कुछ नही ले जा सका।"
- "लेकिन हाथ बाहर क्यों लटकाएं?"

- "क्योंकि मरने से पहले सिकंदर ने चिकित्सको से कहा था कि मुझे इतनी देर के लिए बचा दो की मैं मेरे घर वापस जाकर मर सकूं, भले ही मेरा आधा राज्य तुम ले लो। चिकित्सकों ने कहा,"पूरा राज्य देकर भी अब कुछ नहीं हो सकता।" तब सिकंदर ने वजीर से कहा कि ऐसे राज्य का क्या फायदा जिसे जितने में मैने अपनी जिंदगी खर्च कर दी और इस पूरे राज्य को देकर एक क्षण तक नही खरीदा जा सकता।

वास्तव में सभी वस्तुओं का भोग केवल तब तक है जब तक आप जीवित है, आप स्वस्थ है। वरना करोड़ों की संपदा होते हुए भी यदि आपको मधुमेह हुआ है तो आप मीठा पकवान खरीद तो लेंगे लेकिन इसका भोग नही कर पाएंगे। 

"भोगा ना भुक्ता, वयमेव भुक्ता" हम भोगों को नही भोगते, भोग हमे भोग लेते है। इसलिए धन संपदा, भौतिक संसाधन होते हुए भी किसी वहम में मत रहिए की आप खुश रह लेंगे। सब कुछ होते हुए ही इंद्रिया क्षीण हो जाएंगी और आप कुछ ना कर पाएंगे। जब तक अनश्वर से संबंध नहीं जुड़ेगा, तब तक नश्वर के फेर में पीसते रहेंगे।

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