सत्ता जनता की ही होती है और यह किसी के बाप की जागीर नहीं, खुद को दिल्ली का राजा समझने वाले केजरीवाल को जनता ने ज़मीन पर ला दिया...

सत्ता जनता की ही होती है और यह  किसी के बाप की जागीर नहीं।
 
वर्ष 2015 में 70 में से 68 और 2020 में 62 सीटें जीतने के बाद आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को यह गुमान हो गया था कि दिल्ली प्रदेश की सत्ता अब उन्हीं की जागीर है। सत्ता के इस घमंड में ही केजरीवाल ने बोलने की मर्यादाओं को ताक में रख दिया। देश के प्रधानमंत्री तक के लिए अपशब्द कहे गए। यहां तक कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को गुंडा तक कह दिया। 

70 सीटों वाले प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल स्वयं को देश का प्रधानमंत्री समझने लगे और इसलिए उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, गोवा, हिमाचल आदि राज्यों में चुनाव लडऩे पहुंच गए हालांकि केजरीवाल को पंजाब में सत्ता मिल भी गई, लेकिन इस बार दिल्ली के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने केजरीवाल का घमंड चूर चूर कर दिया।

 8 फरवरी को घोषित परिणाम में केजरीवाल की पार्टी को 70 में से मात्र 22 सीटें मिली, जबकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को 48 सीटें हासिल हुई जिस दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को राजनीति की ऊंचाइयों पर बैठाया, उसी जनता ने केजरीवाल को जमीन पर पटक दिया। 

केजरीवाल की इस हार से राहुल गांधी, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन जैसे नेताओं को सबक लेना चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी भी सत्ता को पिता की जागीर समझते हैं। 

ममता बनर्जी ने तो न केवल केंद्रीय योजनाओं की क्रियान्विति पर रोक लगा रखी है बल्कि राज्यपाल के पद को मानने से ही इंकार कर दिया है। ऐसी ही स्थिति स्टालिन ने तमिलनाडु में भी कर रखी है। 

हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस सरकारें राहुल गांधी के इशारे पर ही चल रही है। ऐसे नेताओं को समझना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है। विपक्ष के  नेता माने या नहीं, लेकिन नरेंद्र मोदी ने जनता को सर्वोपरि माना, इसलिए आज पूरे देश में भाजपा का परचम हो रहा है। 

देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें है तथा लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। लोगों को यह समझ में आ गया है कि मोदी के कारण ही देश का विकास हुआ है। इस विकास का लाभ देश के 25 करोड़ मुसलमानों को भी मिल रहा है। दिल्ली के चुनावों में मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी भाजपा की जीत हुई है जो यह दर्शाता है कि मुस्लिम मतदाता भी मोदी के चेहरे पर भाजपा को वोट दे रहे हैं। यदि ममता बनर्जी और स्टालिन जैसे नेताओं ने अपनी तुष्टिकरण की नीति में बदलाव नहीं किया तो जल्द ही उनका हश्र केजरीवाल जैसा होगा। कांग्रेस को भी हिमाचल, तेलंगाना और कर्नाटक में सत्ता गंवानी पड़ेगी।

67 सीटों पर जमानत जब्त।

कांग्रेस की कमान राहुल गांधी को संभालने के बाद पार्टी में कोई स्पष्ट नीति नहीं रही। राहुल ने 7 माह पहले लोकसभा का चुनाव दिल्ली में केजरीवाल के साथ मिलकर लड़ा, लेकिन विधानसभा का चुनाव कांग्रेस ने केजरीवाल के ही खिलाफ लड़ा। दिल्ली में कांग्रेस के कार्यकर्ता और मतदाता समझ ही नहीं पाए कि आखिर राहुल गांधी की नीति क्या है? कोई नीति नहीं होने के कारण ही दिल्ली में 70 में से 67 कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस स्वयं को देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी मानती है। एक समय था जब देश के सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थी। करीब पचास वर्षों तक कांग्रेस ने केंद्र में सरकार भी चलाई, लेकिन आज उसी कांग्रेस का देश की राजधानी दिल्ली में बुरी हाल का सामना करना पड़ा है। राहुल गांधी संसद में संविधान बचाने के लिए शोर गुल करते हैं। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में 67 सीटों पर कांग्रेस की जमानत जब्त हो जाती है। जब कांग्रेस को देश की राजधानी में ही जनता का समर्थन नहीं मिल रहा है, तब राहुल गांधी किस संविधान को बचाने की बात कर रहे है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है बल्कि पिछले छह चुनावों में दिल्ली में कांग्रेस की स्थिति शून्य है। तीन लोकसभा और तीन विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस की इस बुरी स्थिति का अध्ययन राहुल गांधी को करना चाहिए। यह माना कि लाख कोशिश के बाद भी केंद्र की सत्ता न मिलने से राहुल गांधी बेहद तनावग्रस्त हैं। लेकिन इसके लिए खुद राहुल गांधी ही जिम्मेदार है। राहुल गांधी जिस तरह संसद को बाधित कर रहे हैं, उसका असर भी मतदाता पर प्रतिकूल पड़ रहा है। राहुल गांधी को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि लोकसभा में कांग्रेस के 100 सांसद हैं। पिछला चुनाव कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर लड़ा, इसलिए कांग्रेस के सांसदों की संख्या में इजाफा हो गया।

संजय हिंदुस्तानी 

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