असंवेदनशील और दुःखद - झालावाड़ दुखान्तिका 😭😭पिपलोदी में पांच मासूमों के शव गीली लकडिय़ों और टायरों से जलाए जा रहे थे उसी समय शिक्षा मंत्री मदन दिलावर 51 किलो फूलों की माला पहन रहे थे।
झालावाड़। मनोहर थाना ब्लॉक के पिपलोदी के सरकारी स्कूल में छत गिरने से 25 जुलाई को सात मासूम बच्चों की मौत हो गयी l। इनमें से पांच बच्चों का अंतिम संस्कार 26 जुलाई को पिपलोदी के श्मशान स्थल पर एक साथ किया गया, शर्मनाक पल था वह जब अंतिम संस्कार के लिए श्मशान स्थल पर सूखी लकडिय़ां उपलब्ध नहीं थी और जब गीली लकडिय़ां नहीं जली तो ग्रामीणों ने चिताओं पर पुराने टायर रखे और ज्वलनशील पदार्थ भी डाले।
सात बच्चों की एक साथ मौत होने से ग्रामीण पहले ही दुखी थे लेकिन जिस समय यह सब हो रहा था उसी समय सरकार के स्कूली शिक्षा मंत्री मदन दिलावर भरतपुर में एक समारोह में 51 किलो फूलों की माला पहन रहे थे। समारोह के आयोजकों ने ढोल नगाड़ों से दिलावर का स्वागत किया यानी जब पिपलोदी में मासूम बच्चों के शव टायरों से जलाए जा रहे थे, तब भरतपुर में मंत्री दिलावर ढोल नगाड़ों से अपना स्वागत करवा रहे थे।
सिर्फ 5 शिक्षकों पर कार्रवाई क्यों....!!
26 जुलाई को पिपलोदी में मासूमों का अंतिम संस्कार टायरों से जलाकर किया गया उसमें शिक्षा विभाग के अन्य उच्चाधिकारीयों सहित झालावाड़ प्रशासन पर भी तत्काल प्रभाव से सख्त कदम उठाया जाना चाहिए।
मासूमों का अंतिम संस्कार सम्मान पूर्वक हो, क्या इसकी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की नहीं है ?
क्या प्रशासन अन्यत्र स्थान से शवों के अंतिम संस्कार के लिए सूखी लकडिय़ों का इंतजाम नहीं करवा सकता था ?
जाहिर है कि झालावाड़ प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। ऐसे अधिकारियों को अपने पदों पर रहने का कोई अधिकार नहीं है।
राजे ने भी नहीं दिखाई संवेदनशीलता
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे स्वयं और उनके पुत्र दुष्यंत सिंह गत 6 बार से झालावाड़ संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे है। झालावाड़ के लोगों ने विपरीत परिस्थितियों में भी वसुंधरा राजे और उनके पुत्र दुष्यंत को सांसद विधायक चुना है। मौजूदा समय में भी वसुंधरा राजे विधायक और दुष्यंत सिंह सांसद हैं। पूरे झालावाड़ में वसुंधरा राजे को महारानी की उपाधि दी जाती है। हादसे के बाद वसुंधरा राजे और उनके सांसद पुत्र पिपलोदी के ग्रामीणों के आंसू पोंछने भी गए लेकिन फिर भी 26 जुलाई को ग्रामीणों को अपने मासूमों के शवों का अंतिम संस्कार टायरों से करना पड़ा।
क्या राजे परिवार या उनके नाम पर झालावाड में सत्ता सुख भोगने वाले नेता अपने व्यक्तिगत कोष से सूखी लकडिय़ों का इंतजाम नहीं रकवा सकता था ?
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